तीन पीढ़ियां, एक मां, और ग्रामीण जीवन की वह कहानी जो आपकी मुठ्ठियां अपने आप तन जाएगी।
लेखक देवा झिंज़ाड ने इस उपन्यास को लिखने के लिए चिलचिलाती धूप में नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर चलकर उन जगहों को देखा जो इन घटनाओं की गवाह थीं। पैरों में फ़फ़ोले पड़े, फट गए — पर इस उपन्यास की विश्वसनीयता अड़िग रही।
इस उपन्यास में:
ग्रामीण सामाजिक यथार्थ और सामाजिक चेतना का गहन अन्वेषण मां को केंद्र में रखकर तीन पीढ़ियों का विशाल चित्र यातनाओं और संघर्ष की हृदयविदारक कहानी मराठी में 20 महीनों में 31 संस्करण — हिंदी पाठकों के लिए अब उपलब्ध 8 साल की तपस्या से लिखी गई सरल और सादी भाषा में असाधारण रचना “मां को केंद्र में रखकर साहित्य जगत में लाखों रचनाएं लिखी गई होंगी — लेकिन यह रचना उनमें सबसे अनूठी है।” — डॉ. गोरख थोरात